मित्र
मित्र बनते है सभी, पर मित्र बनना कठिन है |
मित्र बनकर मित्रता का निर्वाह करना कठिन है |
मित्र बनना है अगर तो भूल जाओ स्वार्थ को|
मित्र बनकर रखो याद, बस परमार्थ को |
मित्र यदि गलती करे तो सामने कह दीजिये |
मित्र का जिसमे भला हो, बात वैसी कीजिये |
स्वार्थ छोड़ कपट त्याग,उपदेश देना भूलिए |
मित्र कहकर शत्रुता का भाव रखना भूलिए|
मित्रता अनमोल है , ये सहज, मिलती नही |
टूट जाये, तो उसी रूप में जुडती नही |
जुड़ भी गयी तो , गांठ पड़ने में नहीं कोई संदेह है\
मित्र को पहचान, आँखों से बरसता स्नेह है|
डर है अगर तो आज की,छल भरी इस मित्रता से |
शत्रु अच्छे है, अगर कहकर बने , इस मित्रता से |
शक न करिए मित्र पर मत दूर करिए आंख से|
मित्र दुश्मन बन न जाये, दूर होकर आपसे |
आजकल तो शर्म आती है, मित्रता के नाम पर |
बोल मीठे बोलकर, कब वार कर दे आप पर |
तब न यकीन रहल है, उन पर नं अपने आप पर |
मित्र सच्चा संकटो में हाथ रखना थम के |
प्रतिभा सिंह .........................
रविवार, जुलाई 18, 2010
शनिवार, जुलाई 17, 2010
मंगलवार, जुलाई 13, 2010
सोमवार, जुलाई 12, 2010
गुलाब
फूल है गुलाब के ,गुलाब ही गुलाब है
कोई नीला, कोई पीला, कोई तो लाल है,
है तो पर गुलाब ही
गुलाब ही गुलाल है , गुलाब ही गुलाब है|
एक ही तो फूल है ,गर रंग अनेक है,
फूल है गुलाब के, गुलाब ही गुलाब है
सिखाना है तो सिख इनसे
रंग तो अनेक है ,पर है तो एक ही गुलाब ही
फूल है गुलाब के ,गुलाब ही गुलाब है
प्रतिभा सिंह ................
Pakistani History
The Most Shame Full & Worst Scandal of . Top 248 of Total 8041 Beneficiaries of Notorious NRO by Pervez Musharraf. Collectively they made a collateral damage of 1065 Billion Rupees to Pakistan apart from Charges of Murders, Riots and other serious crimes.
रविवार, जुलाई 11, 2010
पृथ्वी पर प्रलय आने की बात
माया कैलेंडर के मुताबिक वर्ष 2012 में पृथ्वी पर प्रलय आने की बात कही जा रही है। कहा जा रहा है कि कोई उल्का पिंड टकराकर पृथ्वी को तबाह कर देगा। लेकिन आप निश्चिंत रहे। मेक्सिको के एक विशेषज्ञ ने इसे पूरी तरह से खारिज कर दिया है। विशेषज्ञ के मुताबिक यह 1970 में लिखी गई भविष्यवाणी पर आधारित है।
महाविनाश की भविष्यवाणियों की चर्चा
नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एंथ्रोपोलॉजी के निदेशक कार्लोस पल्लान के मुताबिक माया सभ्यता वाला कैलेंडर 5,125 साल लंबे चक्र रूप में है, जबकि माया सभ्यता में दो चक्र वर्ष 2012 तक का ही जिक्र किया गया है।
पल्लान के मुताबिक जब यह चक्र पूरा होगा, 21 दिसंबर, 2012 में ब्रह्मांडीय संतुलन को बाधित करेगा। माया यह नहीं कहता कि दुनिया खत्म हो जाएगी।
‘2012’ प्रलय पर प्रहार का पूरा सच
महाविनाश की भविष्यवाणियों की चर्चा
नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एंथ्रोपोलॉजी के निदेशक कार्लोस पल्लान के मुताबिक माया सभ्यता वाला कैलेंडर 5,125 साल लंबे चक्र रूप में है, जबकि माया सभ्यता में दो चक्र वर्ष 2012 तक का ही जिक्र किया गया है।
पल्लान के मुताबिक जब यह चक्र पूरा होगा, 21 दिसंबर, 2012 में ब्रह्मांडीय संतुलन को बाधित करेगा। माया यह नहीं कहता कि दुनिया खत्म हो जाएगी।
‘2012’ प्रलय पर प्रहार का पूरा सच
ग्लोबल वार्मिंग
जो पानी की बरबादी करते हैं, उनसे मैं यही पूछना चाहता हूँ कि क्या उन्होंने बिना पानी के जीने की कोई कला सीख ली है, तो हमें भी बताए, ताकि भावी पीढ़ी बिना पानी के जीना सीख सके। नहीं तो तालाब के स्थान पर मॉल बनाना क्या उचित है? आज हो यही रहा है। पानी को बरबाद करने वालों यह समझ लो कि यही पानी तुम्हें बरबाद करके रहेगा। एक बूँद पानी याने एक बूँद खून, यही समझ लो। पानी आपने बरबाद किया, खून आपके परिवार वालों का बहेगा। क्या अपनी ऑंखों का इतना सक्षम बना लोगे कि अपने ही परिवार के किस प्रिय सदस्य का खून बेकार बहता देख पाओगे? अगर नहीं, तो आज से ही नहीं, बल्कि अभी से पानी की एक-एक बूँद को सहेजना शुरू कर दो। अगर ऐसा नहीं किया, तो मारे जाओगे।
वैश्विक तापमान यानी ग्लोबल वार्मिंग आज विश्व की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। इससे न केवल मनुष्य, बल्कि धरती पर रहने वाला प्रत्येक प्राणी त्रस्त ( परेशान, इन प्राब्लम) है। ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए दुनियाभर में प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन समस्या कम होने के बजाय साल-दर-साल बढ़ती ही जा रही है। चूंकि यह एक शुरुआत भर है, इसलिए अगर हम अभी से नहीं संभलें तो भविष्य और भी भयावह ( हारिबल, डार्कनेस, ) हो सकता है। आगे बढ़ने से पहले हम यह जान लें कि आखिर ग्लोबल वार्मिंग है क्या।
क्या है ग्लोबल वार्मिंग?
जैसा कि नाम से ही साफ है, ग्लोबल वार्मिंग धरती के वातावरण के तापमान में लगातार हो रही बढ़ोतरी है। हमारी धरती प्राकृतिक तौर पर सूर्य की किरणों से उष्मा ( हीट, गर्मी ) प्राप्त करती है। ये किरणें वायुमंडल ( एटमास्पिफयर) से गुजरती हुईं धरती की सतह (जमीन, बेस) से टकराती हैं और फिर वहीं से परावर्तित ( रिफलेक्शन) होकर पुन: लौट जाती हैं। धरती का वायुमंडल कई गैसों से मिलकर बना है जिनमें कुछ ग्रीनहाउस गैसें भी शामिल हैं। इनमें से अधिकांश ( मोस्ट आफ देम, बहुत अधिक ) धरती के ऊपर एक प्रकार से एक प्राकृतिक आवरण ( लेयर, कवर ) बना लेती हैं। यह आवरण लौटती किरणों के एक हिस्से को रोक लेता है और इस प्रकार धरती के वातावरण को गर्म बनाए रखता है। गौरतलब ( इट इस रिकाल्ड, मालूम होना ) है कि मनुष्यों, प्राणियों और पौधों के जीवित रहने के लिए कम से कम 16 डिग्री सेल्शियस तापमान आवश्यक होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रीनहाउस गैसों में बढ़ोतरी होने पर यह आवरण और भी सघन ( अधिक मोटा होना) या मोटा होता जाता है। ऐसे में यह आवरण सूर्य की अधिक किरणों को रोकने लगता है और फिर यहीं से शुरू हो जाते हैं ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभाव ( साइड इफेक्ट) ।
क्या हैं ग्लोबल वार्मिंग की वजह?
ग्लोबल वार्मिंग के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार तो मनुष्य और उसकी गतिविधियां (एक्टिविटीज ) ही हैं। अपने आप को इस धरती का सबसे बुध्दिमान प्राणी समझने वाला मनुष्य अनजाने में या जानबूझकर अपने ही रहवास ( हैबिटेट,रहने का स्थान) को खत्म करने पर तुला हुआ है। मनुष्य जनित ( मानव निर्मित) इन गतिविधियों से कार्बन डायआक्साइड, मिथेन, नाइट्रोजन आक्साइड इत्यादि ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा में बढ़ोतरी हो रही है जिससे इन गैसों का आवरण्ा सघन होता जा रहा है। यही आवरण सूर्य की परावर्तित किरणों को रोक रहा है जिससे धरती के तापमान में वृध्दि हो रही है। वाहनों, हवाई जहाजों, बिजली बनाने वाले संयंत्रों ( प्लांटस), उद्योगों इत्यादि से अंधाधुंध होने वाले गैसीय उत्सर्जन ( गैसों का एमिशन, धुआं निकलना ) की वजह से कार्बन डायआक्साइड में बढ़ोतरी हो रही है। जंगलों का बड़ी संख्या में हो रहा विनाश इसकी दूसरी वजह है। जंगल कार्बन डायआक्साइड की मात्रा को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करते हैं, लेकिन इनकी बेतहाशा कटाई से यह प्राकृतिक नियंत्रक (नेचुरल कंटरोल ) भी हमारे हाथ से छूटता जा रहा है।
इसकी एक अन्य वजह सीएफसी है जो रेफ्रीजरेटर्स, अग्निशामक ( आग बुझाने वाला यंत्र) यंत्रों इत्यादि में इस्तेमाल की जाती है। यह धरती के ऊपर बने एक प्राकृतिक आवरण ओजोन परत को नष्ट करने का काम करती है। ओजोन परत सूर्य से निकलने वाली घातक पराबैंगनी ( अल्ट्रावायलेट ) किरणों को धरती पर आने से रोकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस ओजोन परत में एक बड़ा छिद्र ( होल) हो चुका है जिससे पराबैंगनी किरणें (अल्टा वायलेट रेज ) सीधे धरती पर पहुंच रही हैं और इस तरह से उसे लगातार गर्म बना रही हैं। यह बढ़ते तापमान का ही नतीजा है कि धु्रवों (पोलर्स ) पर सदियों से जमी बर्फ भी पिघलने लगी है। विकसित या हो अविकसित देश, हर जगह बिजली की जरूरत बढ़ती जा रही है। बिजली के उत्पादन ( प्रोडक्शन) के लिए जीवाष्म ईंधन ( फासिल फयूल) का इस्तेमाल बड़ी मात्रा में करना पड़ता है। जीवाष्म ईंधन के जलने पर कार्बन डायआक्साइड पैदा होती है जो ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव को बढ़ा देती है। इसका नतीजा ग्लोबल वार्मिंग के रूप में सामने आता है।
ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव :
और बढ़ेगा वातावरण का तापमान : पिछले दस सालों में धरती के औसत तापमान में 0.3 से 0.6 डिग्री सेल्शियस की बढ़ोतरी हुई है। आशंका यही जताई जा रही है कि आने वाले समय में ग्लोबल वार्मिंग में और बढ़ोतरी ही होगी।
समुद्र सतह में बढ़ोतरी : ग्लोबल वार्मिंग से धरती का तापमान बढ़ेगा जिससे ग्लैशियरों पर जमा बर्फ पिघलने लगेगी। कई स्थानों पर तो यह प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है। ग्लैशियरों की बर्फ के पिघलने से समुद्रों में पानी की मात्रा बढ़ जाएगी जिससे साल-दर-साल उनकी सतह में भी बढ़ोतरी होती जाएगी। समुद्रों की सतह बढ़ने से प्राकृतिक तटों का कटाव शुरू हो जाएगा जिससे एक बड़ा हिस्सा डूब जाएगा। इस प्रकार तटीय ( कोस्टल) इलाकों में रहने वाले अधिकांश ( बहुत बडा हिस्सा, मोस्ट आफ देम) लोग बेघर हो जाएंगे।
मानव स्वास्थ्य पर असर : जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर मनुष्य पर ही पड़ेगा और कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पडेग़ा। गर्मी बढ़ने से मलेरिया, डेंगू और यलो फीवर ( एक प्रकार की बीमारी है जिसका नाम ही यलो फीवर है) जैसे संक्रामक रोग ( एक से दूसरे को होने वाला रोग) बढ़ेंगे। वह समय भी जल्दी ही आ सकता है जब हममें से अधिकाशं को पीने के लिए स्वच्छ जल, खाने के लिए ताजा भोजन और श्वास ( नाक से ली जाने वाली सांस की प्रोसेस) लेने के लिए शुध्द हवा भी नसीब नहीं हो।
पशु-पक्षियों व वनस्पतियों पर असर : ग्लोबल वार्मिंग का पशु-पक्षियों और वनस्पतियों पर भी गहरा असर पड़ेगा। माना जा रहा है कि गर्मी बढ़ने के साथ ही पशु-पक्षी और वनस्पतियां धीरे-धीरे उत्तरी और पहाड़ी इलाकों की ओर प्रस्थान ( रवाना होना) करेंगे, लेकिन इस प्रक्रिया में कुछ अपना अस्तित्व ही खो देंगे।
शहरों पर असर : इसमें कोई शक नहीं है कि गर्मी बढ़ने से ठंड भगाने के लिए इस्तेमाल में लाई जाने वाली ऊर्जा की खपत (कंजम्शन, उपयोग ) में कमी होगी, लेकिन इसकी पूर्ति एयर कंडिशनिंग में हो जाएगी। घरों को ठंडा करने के लिए भारी मात्रा में बिजली का इस्तेमाल करना होगा। बिजली का उपयोग बढ़ेगा तो उससे भी ग्लोबल वार्मिंग में इजाफा ही होगा।
ग्लोबल वार्मिंग से कैसे बचें?
ग्लोबल वार्मिंग के प्रति दुनियाभर में चिंता बढ़ रही है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस साल का नोबेल शांति पुरस्कार पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में कार्य करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेंट चेंज (आईपीसीसी) और पर्यावरणवादी अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति अल गोर को दिया गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वालों को नोबेल पुरस्कार देने भर से ही ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से निपटा जा सकता है? बिल्कुल नहीं। इसके लिए हमें कई प्रयास करने होंगे :
1- सभी देश क्योटो संधि का पालन करें। इसके तहत 2012 तक हानिकारक गैसों के उत्सर्जन ( एमिशन, धुएं ) को कम करना होगा।
2- यह जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। हम सभी भी पेटोल, डीजल और बिजली का उपयोग कम करके हानिकारक गैसों को कम कर सकते हैं।
3- जंगलों की कटाई को रोकना होगा। हम सभी अधिक से अधिक पेड लगाएं। इससे भी ग्लोबल वार्मिंग के असर को कम किया जा सकता है।
4- टेक्नीकल डेवलपमेंट से भी इससे निपटा जा सकता है। हम ऐसे रेफ्रीजरेटर्स बनाएं जिनमें सीएफसी का इस्तेमाल न होता हो और ऐसे वाहन बनाएं जिनसे कम से कम धुआं निकलता हो।
भोपालवासी डॉ. महेश परिमल का छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. अकादमिक कैरियर है। पत्रकारिता और साहित्य से जुड़े अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 700 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन का लम्बे लेखन का अनुभव है। पानी उनके संवेदना का गहरा पक्ष रहा है।
वैश्विक तापमान यानी ग्लोबल वार्मिंग आज विश्व की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। इससे न केवल मनुष्य, बल्कि धरती पर रहने वाला प्रत्येक प्राणी त्रस्त ( परेशान, इन प्राब्लम) है। ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए दुनियाभर में प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन समस्या कम होने के बजाय साल-दर-साल बढ़ती ही जा रही है। चूंकि यह एक शुरुआत भर है, इसलिए अगर हम अभी से नहीं संभलें तो भविष्य और भी भयावह ( हारिबल, डार्कनेस, ) हो सकता है। आगे बढ़ने से पहले हम यह जान लें कि आखिर ग्लोबल वार्मिंग है क्या।
क्या है ग्लोबल वार्मिंग?
जैसा कि नाम से ही साफ है, ग्लोबल वार्मिंग धरती के वातावरण के तापमान में लगातार हो रही बढ़ोतरी है। हमारी धरती प्राकृतिक तौर पर सूर्य की किरणों से उष्मा ( हीट, गर्मी ) प्राप्त करती है। ये किरणें वायुमंडल ( एटमास्पिफयर) से गुजरती हुईं धरती की सतह (जमीन, बेस) से टकराती हैं और फिर वहीं से परावर्तित ( रिफलेक्शन) होकर पुन: लौट जाती हैं। धरती का वायुमंडल कई गैसों से मिलकर बना है जिनमें कुछ ग्रीनहाउस गैसें भी शामिल हैं। इनमें से अधिकांश ( मोस्ट आफ देम, बहुत अधिक ) धरती के ऊपर एक प्रकार से एक प्राकृतिक आवरण ( लेयर, कवर ) बना लेती हैं। यह आवरण लौटती किरणों के एक हिस्से को रोक लेता है और इस प्रकार धरती के वातावरण को गर्म बनाए रखता है। गौरतलब ( इट इस रिकाल्ड, मालूम होना ) है कि मनुष्यों, प्राणियों और पौधों के जीवित रहने के लिए कम से कम 16 डिग्री सेल्शियस तापमान आवश्यक होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रीनहाउस गैसों में बढ़ोतरी होने पर यह आवरण और भी सघन ( अधिक मोटा होना) या मोटा होता जाता है। ऐसे में यह आवरण सूर्य की अधिक किरणों को रोकने लगता है और फिर यहीं से शुरू हो जाते हैं ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभाव ( साइड इफेक्ट) ।
क्या हैं ग्लोबल वार्मिंग की वजह?
ग्लोबल वार्मिंग के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार तो मनुष्य और उसकी गतिविधियां (एक्टिविटीज ) ही हैं। अपने आप को इस धरती का सबसे बुध्दिमान प्राणी समझने वाला मनुष्य अनजाने में या जानबूझकर अपने ही रहवास ( हैबिटेट,रहने का स्थान) को खत्म करने पर तुला हुआ है। मनुष्य जनित ( मानव निर्मित) इन गतिविधियों से कार्बन डायआक्साइड, मिथेन, नाइट्रोजन आक्साइड इत्यादि ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा में बढ़ोतरी हो रही है जिससे इन गैसों का आवरण्ा सघन होता जा रहा है। यही आवरण सूर्य की परावर्तित किरणों को रोक रहा है जिससे धरती के तापमान में वृध्दि हो रही है। वाहनों, हवाई जहाजों, बिजली बनाने वाले संयंत्रों ( प्लांटस), उद्योगों इत्यादि से अंधाधुंध होने वाले गैसीय उत्सर्जन ( गैसों का एमिशन, धुआं निकलना ) की वजह से कार्बन डायआक्साइड में बढ़ोतरी हो रही है। जंगलों का बड़ी संख्या में हो रहा विनाश इसकी दूसरी वजह है। जंगल कार्बन डायआक्साइड की मात्रा को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करते हैं, लेकिन इनकी बेतहाशा कटाई से यह प्राकृतिक नियंत्रक (नेचुरल कंटरोल ) भी हमारे हाथ से छूटता जा रहा है।
इसकी एक अन्य वजह सीएफसी है जो रेफ्रीजरेटर्स, अग्निशामक ( आग बुझाने वाला यंत्र) यंत्रों इत्यादि में इस्तेमाल की जाती है। यह धरती के ऊपर बने एक प्राकृतिक आवरण ओजोन परत को नष्ट करने का काम करती है। ओजोन परत सूर्य से निकलने वाली घातक पराबैंगनी ( अल्ट्रावायलेट ) किरणों को धरती पर आने से रोकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस ओजोन परत में एक बड़ा छिद्र ( होल) हो चुका है जिससे पराबैंगनी किरणें (अल्टा वायलेट रेज ) सीधे धरती पर पहुंच रही हैं और इस तरह से उसे लगातार गर्म बना रही हैं। यह बढ़ते तापमान का ही नतीजा है कि धु्रवों (पोलर्स ) पर सदियों से जमी बर्फ भी पिघलने लगी है। विकसित या हो अविकसित देश, हर जगह बिजली की जरूरत बढ़ती जा रही है। बिजली के उत्पादन ( प्रोडक्शन) के लिए जीवाष्म ईंधन ( फासिल फयूल) का इस्तेमाल बड़ी मात्रा में करना पड़ता है। जीवाष्म ईंधन के जलने पर कार्बन डायआक्साइड पैदा होती है जो ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव को बढ़ा देती है। इसका नतीजा ग्लोबल वार्मिंग के रूप में सामने आता है।
ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव :
और बढ़ेगा वातावरण का तापमान : पिछले दस सालों में धरती के औसत तापमान में 0.3 से 0.6 डिग्री सेल्शियस की बढ़ोतरी हुई है। आशंका यही जताई जा रही है कि आने वाले समय में ग्लोबल वार्मिंग में और बढ़ोतरी ही होगी।
समुद्र सतह में बढ़ोतरी : ग्लोबल वार्मिंग से धरती का तापमान बढ़ेगा जिससे ग्लैशियरों पर जमा बर्फ पिघलने लगेगी। कई स्थानों पर तो यह प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है। ग्लैशियरों की बर्फ के पिघलने से समुद्रों में पानी की मात्रा बढ़ जाएगी जिससे साल-दर-साल उनकी सतह में भी बढ़ोतरी होती जाएगी। समुद्रों की सतह बढ़ने से प्राकृतिक तटों का कटाव शुरू हो जाएगा जिससे एक बड़ा हिस्सा डूब जाएगा। इस प्रकार तटीय ( कोस्टल) इलाकों में रहने वाले अधिकांश ( बहुत बडा हिस्सा, मोस्ट आफ देम) लोग बेघर हो जाएंगे।
मानव स्वास्थ्य पर असर : जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर मनुष्य पर ही पड़ेगा और कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पडेग़ा। गर्मी बढ़ने से मलेरिया, डेंगू और यलो फीवर ( एक प्रकार की बीमारी है जिसका नाम ही यलो फीवर है) जैसे संक्रामक रोग ( एक से दूसरे को होने वाला रोग) बढ़ेंगे। वह समय भी जल्दी ही आ सकता है जब हममें से अधिकाशं को पीने के लिए स्वच्छ जल, खाने के लिए ताजा भोजन और श्वास ( नाक से ली जाने वाली सांस की प्रोसेस) लेने के लिए शुध्द हवा भी नसीब नहीं हो।
पशु-पक्षियों व वनस्पतियों पर असर : ग्लोबल वार्मिंग का पशु-पक्षियों और वनस्पतियों पर भी गहरा असर पड़ेगा। माना जा रहा है कि गर्मी बढ़ने के साथ ही पशु-पक्षी और वनस्पतियां धीरे-धीरे उत्तरी और पहाड़ी इलाकों की ओर प्रस्थान ( रवाना होना) करेंगे, लेकिन इस प्रक्रिया में कुछ अपना अस्तित्व ही खो देंगे।
शहरों पर असर : इसमें कोई शक नहीं है कि गर्मी बढ़ने से ठंड भगाने के लिए इस्तेमाल में लाई जाने वाली ऊर्जा की खपत (कंजम्शन, उपयोग ) में कमी होगी, लेकिन इसकी पूर्ति एयर कंडिशनिंग में हो जाएगी। घरों को ठंडा करने के लिए भारी मात्रा में बिजली का इस्तेमाल करना होगा। बिजली का उपयोग बढ़ेगा तो उससे भी ग्लोबल वार्मिंग में इजाफा ही होगा।
ग्लोबल वार्मिंग से कैसे बचें?
ग्लोबल वार्मिंग के प्रति दुनियाभर में चिंता बढ़ रही है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस साल का नोबेल शांति पुरस्कार पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में कार्य करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेंट चेंज (आईपीसीसी) और पर्यावरणवादी अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति अल गोर को दिया गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वालों को नोबेल पुरस्कार देने भर से ही ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से निपटा जा सकता है? बिल्कुल नहीं। इसके लिए हमें कई प्रयास करने होंगे :
1- सभी देश क्योटो संधि का पालन करें। इसके तहत 2012 तक हानिकारक गैसों के उत्सर्जन ( एमिशन, धुएं ) को कम करना होगा।
2- यह जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। हम सभी भी पेटोल, डीजल और बिजली का उपयोग कम करके हानिकारक गैसों को कम कर सकते हैं।
3- जंगलों की कटाई को रोकना होगा। हम सभी अधिक से अधिक पेड लगाएं। इससे भी ग्लोबल वार्मिंग के असर को कम किया जा सकता है।
4- टेक्नीकल डेवलपमेंट से भी इससे निपटा जा सकता है। हम ऐसे रेफ्रीजरेटर्स बनाएं जिनमें सीएफसी का इस्तेमाल न होता हो और ऐसे वाहन बनाएं जिनसे कम से कम धुआं निकलता हो।
भोपालवासी डॉ. महेश परिमल का छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. अकादमिक कैरियर है। पत्रकारिता और साहित्य से जुड़े अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 700 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन का लम्बे लेखन का अनुभव है। पानी उनके संवेदना का गहरा पक्ष रहा है।
वास्ता
मैं उड़ता हुआ एक ख्वाब हूँ
साहिल से मिलने को दरिया बेताब हूँ
आग है मुझमें, मुझमें है पानी
मैं खुदा की नेमत लाजवाब हूँ
थाम लो मुझको जो थाम सको तो
आंक लो मुझको जो आंक सको तो
आसमान का रास्ता मुझसे
रब का वास्ता मुझसे
मैं अरमानो का उमड़ता एक सैलाब हूँ
मैं उड़ता हुआ एक ख्वाब हूँ
मैं उड़ता हुआ एक ख्वाब हूँ ..
साहिल से मिलने को दरिया बेताब हूँ
आग है मुझमें, मुझमें है पानी
मैं खुदा की नेमत लाजवाब हूँ
थाम लो मुझको जो थाम सको तो
आंक लो मुझको जो आंक सको तो
आसमान का रास्ता मुझसे
रब का वास्ता मुझसे
मैं अरमानो का उमड़ता एक सैलाब हूँ
मैं उड़ता हुआ एक ख्वाब हूँ
मैं उड़ता हुआ एक ख्वाब हूँ ..
..उड़ता हुआ एक ख्वाब
कितनी common बात है, आज फिर रात है..
आज फिर सोया है सूरज, फिर तारों की बरात है..
फिर हंसा है काल, फिर रोया आकाश है
आज फिर रात है.. कितनी common बात है...
आज फिर सोया है सूरज, फिर तारों की बरात है..
फिर हंसा है काल, फिर रोया आकाश है
आज फिर रात है.. कितनी common बात है...
रविवार, अप्रैल 11, 2010
GENERATION GAP
Generation gap??? what is it??
is it gap that may be giving you some trouble because of differance in ages between you and your parents, grand parents, teachers or it is some thing that you invent to explain any ideas asnd points of views that differ you elders?
Impudent, agitated, irresponsible, carefree, irrational and narcissistic.
there are some of the titles which we, the members of presents generations hold,
people belonging to older gernerations have a lot of misconception, which are teenagers are cancerned and i want tio make an endeavour to clear some of there misconceptions.
Older generations think thast we teenagers are irresponsible and impodent but we are not ,
we realize what an expectes of us and we do not beliaveshrking our responsibilities.
Another thing which older generations says abouts us, is that we are blindly following western culture and forgetting oue culter and morals are irresponsible part of our beautiful Indian Culture......
Generation gap??? what is it??
is it gap that may be giving you some trouble because of differance in ages between you and your parents, grand parents, teachers or it is some thing that you invent to explain any ideas asnd points of views that differ you elders?
Impudent, agitated, irresponsible, carefree, irrational and narcissistic.
there are some of the titles which we, the members of presents generations hold,
people belonging to older gernerations have a lot of misconception, which are teenagers are cancerned and i want tio make an endeavour to clear some of there misconceptions.
Older generations think thast we teenagers are irresponsible and impodent but we are not ,
we realize what an expectes of us and we do not beliaveshrking our responsibilities.
Another thing which older generations says abouts us, is that we are blindly following western culture and forgetting oue culter and morals are irresponsible part of our beautiful Indian Culture......
AA USE THE POWER OF SOLITUDE
solitude is in way lovely word. when there is no body elsre there is solitude.
At nighthear the sound of flowing river , chirping og birds ever our heart beats. All this happens in day time as well but we do not hear
why?
Because there are so many people. It means that if you have to hear th e true voicw. You need peace and you need solitude.
we need solitude to hear our selvers to talk to ourselvers, the biographical of great mentell us that all of them thought in solitude.
In such thinking moments our sub-conscious mind, hence the decision taken at such moments are likely to be correct.
Talk to your self in solitude and increase your amaginatve power, Imagine, to the exteme. Remember that by imaginating every thing becomes more valuable. Do not ever see what is there, see what can be there for this is very good investment but you have to give time for it. For example the land which you purchased for Rs. 22000 ten years ago is now worth Rs. 28 lakhs. iyt is not a miracle of imagination which has foreseen ang anticipated the fature rise in the price of its real state.
Leave time for your leisure and pleasure. Give time to you hobbies, family and friends. By doing this, a busy man can also become a happy man other wise he will be busy but unhappy all the same....
solitude is in way lovely word. when there is no body elsre there is solitude.
At nighthear the sound of flowing river , chirping og birds ever our heart beats. All this happens in day time as well but we do not hear
why?
Because there are so many people. It means that if you have to hear th e true voicw. You need peace and you need solitude.
we need solitude to hear our selvers to talk to ourselvers, the biographical of great mentell us that all of them thought in solitude.
In such thinking moments our sub-conscious mind, hence the decision taken at such moments are likely to be correct.
Talk to your self in solitude and increase your amaginatve power, Imagine, to the exteme. Remember that by imaginating every thing becomes more valuable. Do not ever see what is there, see what can be there for this is very good investment but you have to give time for it. For example the land which you purchased for Rs. 22000 ten years ago is now worth Rs. 28 lakhs. iyt is not a miracle of imagination which has foreseen ang anticipated the fature rise in the price of its real state.
Leave time for your leisure and pleasure. Give time to you hobbies, family and friends. By doing this, a busy man can also become a happy man other wise he will be busy but unhappy all the same....
How north America Has Started to save its
arctic region
In 1980 the U.S. congress created the arctic the national wildlife refuge (ANMR)
in Alaska. it covers 7.3 million hectare of undisturbed tundra, wet lands and glaciers. it is one of the last remaining areas of unspoiled nature in the world. under the thin layer of soil there is permanent frost, ice that does not melt even in summer.
ANWR is home to wide varity of animals and birds like caribou, polar bears, arctic foxes, peregrine falcons, musk caribou, return here after spending the winter in canada.
ANWR is a delicate nature region and can easily damaged by human interference.
Envionmentalists have always wanted the area to be left undisturbed for the region, however, it has deposits of oil.
the envionmentalists say that any drilling poses a permanent threat to be delicate balance of nature. what is more, the oil will last long but we would have already certificed nature. The Us congress is likely to approve the deilling operation soon but without distubing envionment in eco friendly way........................
arctic region
In 1980 the U.S. congress created the arctic the national wildlife refuge (ANMR)
in Alaska. it covers 7.3 million hectare of undisturbed tundra, wet lands and glaciers. it is one of the last remaining areas of unspoiled nature in the world. under the thin layer of soil there is permanent frost, ice that does not melt even in summer.
ANWR is home to wide varity of animals and birds like caribou, polar bears, arctic foxes, peregrine falcons, musk caribou, return here after spending the winter in canada.
ANWR is a delicate nature region and can easily damaged by human interference.
Envionmentalists have always wanted the area to be left undisturbed for the region, however, it has deposits of oil.
the envionmentalists say that any drilling poses a permanent threat to be delicate balance of nature. what is more, the oil will last long but we would have already certificed nature. The Us congress is likely to approve the deilling operation soon but without distubing envionment in eco friendly way........................
A minute can change your destiny
Time exists, hence we exist, In our practical life we do not realize its true value,
However the truth is that a minute can change your life destiny.
Why does an astrologer want to know your accurate time. If there is a slight error in birth time there may be a severe error in the predication of the native chart i.e. kundli..
This happened with Goswami Tulsi Das. His father was a renowned astrologer .
However due to an error in birth time, he predicted that Tulsi DAs would be a wicked and unfortunate. what was the truth every one knows.
Minutes are important not only in the preparation of native charts but also in building the castles. If you take carfe of the minute, hours will take care of themselves. So treat every minute as a brick, with which you build the castly of your DREAM...
Time exists, hence we exist, In our practical life we do not realize its true value,
However the truth is that a minute can change your life destiny.
Why does an astrologer want to know your accurate time. If there is a slight error in birth time there may be a severe error in the predication of the native chart i.e. kundli..
This happened with Goswami Tulsi Das. His father was a renowned astrologer .
However due to an error in birth time, he predicted that Tulsi DAs would be a wicked and unfortunate. what was the truth every one knows.
Minutes are important not only in the preparation of native charts but also in building the castles. If you take carfe of the minute, hours will take care of themselves. So treat every minute as a brick, with which you build the castly of your DREAM...
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